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| मनहूस आत्मा |
शिवम् बचपन से ही भूत-प्रेत की कहानियों में विश्वास करता आया, अँधेरे से उसे आज भी डर महसूस होता था। आज भी देर रात वो जब कभी दफ्तर या किसी मित्र की लेट नाईट पार्टी से घर लौटता तो किसी को साथ लेकर ही चलता। उसे आज भी अपने परिजन की मृत्यू पर बिताई शमशान की वो रात याद थी जब वो जीवन मे पहली बार वहां गया था।
एक तरफ पड़े शव की स्थिलता, उसका ठंडापन, जलते मांस की दुर्गंध और उससे उठता काला धुँआ। घड़ी-घड़ी अकड़कर लाश का उठ बैठना। हर परछाईं उसे वहां किसी रात की अपनी अलग सत्ता का एहसास करा रही थी जो उस बियावान श्मशान में और भी ज्यादा हावी, शशक्त जान पड़ती थी। वहां से लौटते वक्त पंडित का दिया स्पष्ट निर्देश मानों उसके जीवन का हिस्सा बन गया था। `बाबूजी पीछे पलटकर मत देखना नहीं तो आत्मा अपना मोह जानकर साथ लौट आएगी।`
आज उम्र के इस पड़ाव पर जब वो सोखा के पास जा रहा था तो उसके मन में अनगिनत आशंकाए बलवती जा रही थी। यथासंभव वो अपनी आधुनिक शिक्षा के अनुरूप खुद को समझा रहा था कि भूत- प्रेत नहीं होते, पर बार-बार उसे एहसास हो रहा था कि कोई उसका पीछा कर रहा है जो उसे वहां जाने से रोक रहा था। एक तो सोखा और वो भी घर से इतना दूर।
राहगीरों, दुकानदारों से बार-बार वो सही पता पूछता आगे बढ़ रहा था, बीतते हर क्षण जैसे-जैसे उसे सोखा के पास पहुंचने में देरी हो रही थी वो खुद में डूबता सा महसूस कर रहा था और इस उधेड़-बुन में उसे बिल्कुल भी विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई दूसरा व्यक्ति उसकी समस्याओं का समाधान किसी जादू-टोने से कर सकता हैं।
रास्तें में जो मिलता उसके पहनावें और बोल-चाल की शैली को देख कर चकित हो जाता कि पढ़ा- लिखा प्रौढ़ भी भूत-प्रेत की कहानियों में विश्वास करता है और सभी उसे लौटने की सलाह दे रहे थे। अपनी मजबूरी, ऊहापोह और लाचारी का मारा शिवम् हर क्षण सदियों की दूरी तय करने के सामान आगे बढ़ रहा था।
सोखा का गांव बड़ा ही मनोहारी था, कच्चे-पक्के गांव के मेढ़ और चारों तरफ फैले खेतों के बीच से गुजरती शिवम् की मोटरसाइकिल। अपनी लाखों समस्याओं के बीच उसे मानो उसकी मन मांगी मुराद पूरी होने का एहसास हो रहा था आज उसका वर्षो पुराना साथी, वो मनहूस भूत उस से छूटने वाला था जिसने जाने-अजनाज़े में उसके जीवन में सुख-दुःख के कई रंग भरे थे।
इस बुरी स्थिति में भी उसे बीते सुनहले साल याद आ रहे थे, याद आ रहा था कॉलेज के परीक्षा परिणामों में सफल होना जब उसने बीटेक जैसे कठिन कोर्स की पढाई भी नहीं की थी। प्रियसी के साथ उसका मधुर संबंध, उस मनहूस भूत के कारण ही था जबकि उसकी प्रियसी उसे थोड़ा भी पसंद नहीं करती थी।
सामने मानो सबकुछ फिर से घटित होता सा महसूस हो रहा था, हर क्षण सालों से किसी का उसके अंदर निर्भिक जीवन जीना, कभी शिवम की मर्जी के अनुरूप तो कभी उसकी इच्छा के विपरीत। ये कुछ ऐसा था जो वो हर पल जी रहा था पर सत्य है या कल्पना इसका निर्धारण वो चाह कर भी नहीं कर पाया था।
शिवम् सोखा के पास नहीं जाता अगर उसका मनहूस भूत साथी उसके जीवन में उथल-पुथल न मचा रहा होता। मानव स्वाभाव के अनुसार वो भी अपने मनहूस गधे भूत को भी बाप बना लेता था और जब कोई उसकी मनचाही मुराद के विपरीत घटना होती तो उस मनहूस भूत से नाराज हो जाता। अभी हालिया शिवम् की नौकरी के सिलसिले में उस भूत ने कुछ ऐसा किया कि शिवम् को किसी सोखे की आवश्यकता आन पड़ी। इंटरव्यू में उस मनहूस भूत ने उसे इंटरव्यू पैनल में बैठी एक शिक्षिका से लड़ने को मजबूर कर दिया था जिसके कारण उसका सलेक्शन नहीं हो पाया था। उसका हालिया व्यापारिक घाटा और भी बहुत कुछ।
इन्हीं विचारों के बुलबुलों में डूबता-उतरता शिवम् शाम तक सोखा के पास जा पहुंचा।
रोबदार आवाज और विचित्र चेहरे का मालिक वो सोखा शिवम् को देखते ही मानो सब कुछ समझ गया था, उसने उसे दूर ही बैठने को कहा और आसमान से बातें करने लगा। क्या सुरेंदर इसे छोड़ोगे कि नहीं? अचानक शिवम् के मुँह से निकला नहीं।
अब तो मानो शिवम् के रोंगटे खड़े हो गए, वर्षो का उसका शक सही साबित हो रहा था, जब तक हम अपनी आँखों से कुछ सत्य चेतन अवस्था में देख नहीं लेते तब तक उसे सत्य नहीं मानते। शिवम् के साथ भी ऐसा ही कुछ घटित हो रहा था।
सोखा अट्ठाहास करता हुआ अपने मंत्र पढ़ रहा था और घड़ी -घड़ी शिवम् पर अक्षत फेक रहा था। शिवम् को एहसास हो रहा था कि कुछ उसके भीतर जल रहा है और अब वो काफी पीड़ा में था। उसको अपने अंदर किसीके वास्तविक रूप में होने का ऐसा असली एहसास पहले कभी नहीं हुआ था। आज उसकी वैज्ञानिक सभी अवधारणाएं टूट रही थी और वो खाली होता जा रहा था।
धीरे-धीरे वो अचेत होता जा रहा था और घुप्प अँधेरा उसे अपने आगोश में समेटता जा रहा था। जब शिवम् की आँखे खुली तो वो अपनी जगह पर ही सो रहा था और रात के २ बज रहे थे। प्यास से उसका बुरा हाल था अभी उसे पानी कहकर कुछ भी पिला दिया जाता तो वो सहृदय पेय को स्वीकार कर लेता। उसने इधर-उधर देखा तो सोखे के बैठने के स्थान पर एक लोटा रखा था जिससे सोखा उस पर अक्षत के साथ पानी फेक रहा था। उसने झटपट उस लोटे को उठाया और रखा पानी पी गया।
इतने मे न जाने कहाँ से सोखा प्रकट हो गया और उस ने कहा चलो तुन्हे छोड़ आउ। विचित्र घटनाओं और शाम की नींद के बाद शिवम् तरोताजा महसूस कर रहा था और अपने मिलनसार स्वभाव से वो अब सोखा से उसके बारे में जानना चाह रहा था। इस आग्रह को वो कैसे ठुकरा सकता था वो झटपट खड़ा हो गया और सोखा के पीछे-पीछे चलने लगा। सोखा उससे बाते करता आगे-आगे बढ़ रहा था और पीछे-पीछे शिवम् था।
सोखा ने शिवम् से पूछा और कहां के रहने वाले हो...
आगे एक मोड़ पर सोखा ने कहा कि शिवम् किसी भी स्थिति में पीछे मुड़ कर मत देखना, शिवम् ऐसा ही कर रहा था और आगे बढ़ रहा था रात के अँधेरे में उसका पैर किसी पत्थर से टकरा गया और वो खेत में गिर पड़ा जब वो उठा तो उसने देखा कि न तो वहां सोखा था न ही कोई और। उसने सोखा के घर की ओर देखा तो उसका शरीर अब भी सोखा के आँगन में लेटा हुआ था। पर अब उसे उधर जाने की आवश्यकता नहीं महसूस हो रही थी और वो सामने ही की पेड़ पर आराम से बैठ कर अपने शरीर को देखना चाह रहा था कि निष्प्राण सोए हुए वो कैसा लगता है।
-सिद्धार्थ 'शून्य'

वाह बहुत अच्छी कहानी।। लिखते रहिये,, लेख का इंतज़ार है।।
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