एक नायिका का नायक प्रकृति का कोना-कोना एक सामान ही है बस लोगो का उस को देखने का नजरिया बदल जाता है जो किसी को लेखक तो किसी को कुछ और बनाता है। इसी तरह सभी नर-नारी भी एक ही सामान है चाहे दुनिया के किसी कोने में चले जाओ बस देखने का ये नजरिया जो है न वही उन्हें अलग-अलग रूप प्रदान करता है। बाबा धुआँधर के शब्द मेरे कानों के पर्दो को झकझोर रहे थे सत्य क्या है क्या यही सत्य है। तो 'ऐज युसुअल' मैंने मुँह में एक पान का बीड़ा दबा लिया और रंगत घुलते ही पुचाक से थूक कर अपने रिक्शे वाले से कहा चलो भाई अब रिक्शा आगे बढ़ाओ चाहो तो तुम भी पान का एक बीड़ा खा सकते हो तो उसने कहा "बाऊजी नशा बुरी चीज है।" मैंने कहा फिर क्या तब रिक्शा आगे बढ़ाओ या कोई मुहर्त निकलवाना पड़ेगा ? मन फिर भी असमंजस में था धुआँधार बाबा के शब्द जो तेज होती सड़क की चहल-पहल में भी कानो को अब तक झकझोर रहे थे ऐसे थे कि मानो जाने का नाम ही नहीं ले रहे थे। कुछ न समझ पाने की स्थिती में मैंने रिक्शे वाले से पुछा...
मनहूस आत्मा शिवम् बचपन से ही भूत-प्रेत की कहानियों में विश्वास करता आया, अँधेरे से उसे आज भी डर महसूस होता था। आज भी देर रात वो जब कभी दफ्तर या किसी मित्र की लेट नाईट पार्टी से घर लौटता तो किसी को साथ लेकर ही चलता। उसे आज भी अपने परिजन की मृत्यू पर बिताई शमशान की वो रात याद थी जब वो जीवन मे पहली बार वहां गया था। एक तरफ पड़े शव की स्थिलता, उसका ठंडापन, जलते मांस की दुर्गंध और उससे उठता काला धुँआ। घड़ी-घड़ी अकड़कर लाश का उठ बैठना। हर परछाईं उसे वहां किसी रात की अपनी अलग सत्ता का एहसास करा रही थी जो उस बियावान श्मशान में और भी ज्यादा हावी, शशक्त जान पड़ती थी। वहां से लौटते वक्त पंडित का दिया स्पष्ट निर्देश मानों उसके जीवन का हिस्सा बन गया था। `बाबूजी पीछे पलटकर मत देखना नहीं तो आत्मा अपना मोह जानकर साथ लौट आएगी।` आज उम्र के इस पड़ाव पर जब वो सोखा के पास जा रहा था तो उसके मन में अनगिनत आशंकाए बलवती जा रही थी। यथासंभव वो अपनी आधुनिक शिक्षा के अनुरूप खुद को समझा रहा था कि भूत- प्रेत नहीं होते, पर बार-बार उसे एहसास हो रहा था कि कोई उसका पीछा कर रहा है जो उसे वहां जाने से रोक रहा था। एक तो...