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स्वरूपणी

स्वरूपणी 

लिंग की महत्ता का भान उस दिन हुआ जब किसी ने बताया हरसिंगार स्त्रीलिंग नहीं वरन पुल्लिंग है। कैसे हम किसी भी जीजिविषा से परिपूर्ण पुष्प का नाम पुरुष की कूप-मण्डूकता पर रख सकते हैं। हास्य और रहस्य से अपूर्ण जीवन की आहुति व्यर्थ नहीं वरन ऋणात्मक है। कपोलकल्पित शब्दों की धारणा टूट क्यों नहीं जाती जब बरसात के अवसान के बाद हरसिंगार जो पुलिंग है अपने पुष्पों से विरक्त होकर धीरे-धीरे पूरी पत्तियों तक को गिरा देता है। ऐसा हो ही नहीं सकता की पुरुष में निष्काम भाव की उत्पत्ति हो जाए। ये ब्रह्म वाक्य केवल दर्प के सामान होता है जो मनुष्य को बाहर और भीतर दोनों ओर से खां जाता है। और जीवन को निष्प्राय बनाकर मृत्यु को सत्य कह बैठता है। फिर लोक परलोक की अवधारणा ...

आज व्योम अपने इन्ही मनोभावों के साथ आगे बढ़ता बाग़ीचे तक आ पहुँचा था पुनः सिंचित होने को।वहीं बाग़ीचा जिसने उसे जीवन के कठिन रास्तों पे एक आत्मीय सार्थवाह की तरह रास्ता दिखाया था। जब कभी भी उसका मन खिन्न हो उठता तो वह बाग़ीचे में आकर बैठ जाता  था। अपने उम्र के अवसान पर उसे बीते दिन बहुत याद आते थे जब उसने एक-एक कर स्वयं इन फूलों से सुसज्जित बग़ीचे का निर्माण किया था। आज बाग़ीचें में पहुँचते ही वह हरसिंगार के कुछ पुष्प उठा लाया और उन्हें ध्यान से देखने लगा। रचना यक़ीनन उस स्वरूपणी की ही थी बस नाम निर्धारण में स्वरूपणी ने गलती कर दी। काफी देर तक वो हरसिंगार के नारंगी ठूठ को देखता रहा। उसकी मनमोहक ख़ुश्बू उसे सराबोर कर रही थी। अचानक उसे ध्यान आया की आज ही के दिन उसने करीबन छह साल पहले पृथा से अपने सरे रिश्ते नाते तोड़ लिए थे। पृथा की गलती बस इतनी थी कि वो व्योम से विवाह नहीं कर सकती थी। व्योम ने एक बार भी दुनियावी दिखावे से निकलकर उससे सम्बन्ध बनाए रखने के बारे में नहीं सोचा। बस कह दिया आज से तुम और मैं अलग। तुम्हारे अपने रस्ते और मेरे अपने।

व्योम की आँखों से आंसुओ की धार बह रही थी और वो हरसिंगार के पुष्प सा बिल्कुल खली हो रहा था।

घुली हो तुम मुझ में बस इतनी सी, मैं सम्पूर्ण समाहित हूं तुम में।


-सिद्धार्थ 'शून्य' 

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