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दर्प का दर्पण

दर्प का दर्पण 

निश्छल भाव से वो मेरी निगाहों में देर तक देखती और कुछ न कहती। लगता उसका सारा संसार ही मैं हूँ और वो मेरी आँखों में समाहित हो मुझमे खो जाना चाहती है। प्यार के इस रंग को और क्या नाम दे सकता था। मैंने भावविभोर हो उसे एक दिन कह ही दिया प्रियतमा? बस फिर क्या था किस्सागोई में मेरी और उस की नजदीकियों को कोई संकलित कर लेता...

जीवन का आधार अगर कही नौकरी है तो तापस नौकरी ही करने की सोंच रहा था। अत्यंत निम्न वर्ग का यह २० २२ साल का नवयुवक अपनी कॉलेज की पढाई कर रहा था। वो दिन भर अपनी पढाई में ध्यान देने के साथ ही साथ बहुत से लोगों से मिलता और अपनी नौकरी की बात करता।उसके घर में उसकी मां के अलावा और कोई न था।  उन दिनों नौकरियां लगभग समाप्त थी। लोग छोटे-मोटे कामों के लिए मजदूर रख लेते और अधिकतर बड़े काम विशेषज्ञों से करवाते। पढाई के साथ जितनी नौकरियां हो सकती थी उन सब की तापस ने एक लिस्ट बना रखी थी और रोज़ वो इस लिस्ट को देखकर बहुत से लोगो से अपनी नौकरी की बात करता।कठिन परिस्थियों के इस दौर में तापस कुछ जगहों पर ट्यूशन देता और इसी तरह अपनी मझधार में फंसी नाव को खेने की कोशिश कर रहा था। इन सब के बीच तापस अपनी छोटी सी दुनियां को अथाह सागर सा विस्तृत करने के ख्वाब देख रहा था। बेचारा दुनियां की सच्चाई से बिल्कुल बेखबर दीवाना पागल ही था। 

उसकी इन छोटी-छोटी कोशिशों और ख्वाबों का एक राजदार भी था उसकी सबसे अच्छी दोस्त आकांक्षा। जाने कब वो तापस से प्रेम करने लगी थी उसे भी नहीं पता। हां इतना जरूर था की इसे वासना का नाम अगर लोग देतें तो किस्सागोई की जहमत कोई न उठाता। 

एक दिन बागीचें में तापस और अकांक्षा बैठे थे तापस अपनी ही सोंच में डूबा नौकरियों और भविष्य के बारे में सोच रहा था और आकांक्षा उसकी जीवन की कठनाइयों से लड़ती गहरी आँखों में निःशव्द एकटक देखे जा रही थी। यूं तो आकांक्षा ने पहले भी कई बार तापस के विषय में सोंचा था और कई रातें वो करवटे बदलते बीता चुकि थी पर आज उस देवता को कुछ और ही मंजूर था। पहली बार आज अचानक आकांक्षा की दबी ईक्षा बाहर आई थी उसने तापस के अधरों को सहलाते हुए कहाँ। तापस कुछ न कहना आज मुझे अपनी बात पूरी करने देना। तुम अपनी ही दुनियां में परेशान रहते हो और मुझ से मेरे बारे में कुछ भी नहीं पुछ्ते। मैं तुमसे तुम्हारी भावनाओं से ज्यादा समझती हूँ। और दावें के साथ कह सकती हूँ कि मुझे तुम से प्रेम हैं। 

मुझे किस्से कहानियों में लिखे प्रेम पर कभी विश्वास नहीं था पर आज मैं तुमको छूने से खुद को रोक नहीं पा रही हूँ। तुम्हारी आँखों में मुझे एक अजनबी कशिश दिखाई देती है जो मुझे तुम्हारे पास बार-बार खींच लाती है। जाने कितनी रातें मैंने जागते हुए बिताई हैं तुम्हारे बारे में सोचते हुए। अब अगर मैं ऐसे प्रेम को नाम नहीं दूंगी तो मेरा अस्तित्व ही मुझे नकार देगा। मैं ये भी जानती हूँ कि तुम जिन परिस्थितियों में हो तुम्हे कभी भी जीवन में प्रेम का अहसास नहीं होगा। पर फिर भी आज मैं अपने प्रेम का इजहार तुम से कर रही हूँ और अगर मेरा प्रेम सत्य है तो जीवन भर तुम मुझे अपने साथ ही रखोगे। 

इस एक वाक्ये ने तापस और आकांक्षा की जिंदगियां बदल दी। तापस को एक और जिम्मेदारी का एहसास होने लगा और आकांक्षा को अतृप्त प्रेम। आकांक्षा दिनभर इस अतृप्त प्रेम के सागर में गोते लगाना चाहती थी तो तापस अपनी जिम्मेदारियों को और अच्छी तरह से निभाना चाहता था। हलाकि जीवन के इस दोराहे पर तापस ने कुछ ऐसा स्वीकारा था जो उसे कभी भी जीवन में दोबारा प्रेम नहीं करने देगा। समय बीतता जा रहा था और आकांक्षा अपनी प्रेम की गहराइयों में डूबती जा रही थी और उसका व्यक्तित्व और निखरता जा रहा था। 

तापस न तो कोई काम ही ठीक ढंग से कर पा रहा था और न ही प्रेम में डूब उतर रहा था। वो एक उधार की जिंदगी जी रहा था जिसमे वो सबकुछ करते हुए भी किसी मकान में बसने वाले किराएदार की तरह अधिकार से कुछ भी निर्णय नहीं ले सकता था। 

यूँ तो किस्सागोई में तापस और आकांक्षा ने जीवन के कई और मुकाम हासिल किये। जिनमे कुछ अनुभव नए थे और कुछ किताबी बाते। पर हम यहाँ वो पूरी कहानी नहीं सुनेंगे। 

बस इतना जान लेते है की एक दिन यूँ ही जीवन के किसी मोड़ पर तापस का अस्तित्व समाप्त हो गया और उसेक स्थान पर जन्म लिया किस दर्प के दर्पण में बसे समाज ने। 

-सिद्धार्थ 'शून्य' 

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